नारी शक्ति

मैं नारी हूं , नारायणी हूं

मैं प्रेम हूं , पराकाष्ठा हूं

मैं त्याग हूं , समर्पण हूं

मैं भक्ति हूं , मैं जोगन भी हूं

मैं बेटी हूं , ब्याहता हूं

मैं पत्नी हूं , प्रेमिका हूं

में ममता हूं , वात्सल्य हूं

मैं नाजुक हूं , कोमल भी हूं

मैं शक्ति हूं , सामर्थ्य हूं

मैं कल्याणी हूं , संहारक हूं

मैं अस्तित्व हूं , संरक्षक हूं

मैं उत्पत्ति हूं , विनाश भी हूं

मत आंकना मुझे पुरूषत्व से कभी

मैं प्रकृति हूं , सम्मपूर्ण हूं।

 

कविता- श्रद्धांजलि

महफूज रखते हैं लाखों चिराग घर के

मिटा के रौशनी खुद अपनें घरों की

सुला के हमें अपनों की पनाह में

खुद सोते हैं तो बस कफन ढकते हैं

देकर हमें जिंदगी बिना दहशत की

खुद दहशतों से रूबरू दिन-रात लड़ते हैं

देकर हमें परिवार में रहने का सुकून

खुद को बेघर कर मां भारती का लाल कहते हैं

देकर हमें ख्वाब हर खुशी को पाने का

खुद रखते हैं ख्वाब देश के लिए मर-मिटने का

कुछ अलग ही मिट्टी के ये जवान होते हैं

दिखते तो हम जैसे ही हैं लेकिन

हमसे कहीं बेहतर दिल के इंसान होते हैं।

मैं एक औरत हूं

हां मैं एक औरत हूं

मुझमें रंग है,

इबादत का, इनायत का

रग़बत(लगाव) का, रफ़ाक़त(साथ) का

काविश(प्रयास) का, गुजारिश का

लहजे का , लिहाज़ का

नज़ाकत(कोमलता) का, नफ़ासत(सुन्दरता) का

मोहब्बत का , शहादत का।

कविता – नया साल

सिलसिला सालों का कुछ यूं ही चलता रहता है

बीत जाता है एक तो एक नया रूख लेता है

दिल में समेंटकर ढेरों अनुभव जिंदगी के

कुछ आशाओं और निराशाओं से उबरकर

कुछ उथल-पुथल और कुछ ठहराव मन को देकर

कुछ नमकीन आंसू और मीठी मुस्कान भरकर

कुछ फीके रिश्ते भुलाकर और नये रिश्ते संजोकर

कुछ शिकवे-गिले मिटाकर और उमंग दिल में भरकर

फिर नये साल में जीवन एक नये फूल सा खिलता है।

 

शायरी

वो भोलापन वो सादगी और वो मीठी सी मस्ती

मुझमें हमेशा साज रहने दो

ले लो समझदारी मेरी सारी बस,

मुझमें मेरा बचपन आबाद रहने दो।