कविता- जिंदगी के रंग मेरी कलम से

माना कि तजुर्बा इतना नहीं के बयां कर सकूं जिंदगी के हर रंग

लेकिन तजुर्बा इतना भी कम नही कि लिख न सकूं जिंदगी के दो-चार रंग

बहुत खूबसूरत है ये जिंदगी यारों जीनें के लिए बस खुशनुमा नजरिया चाहिए

हम बहुत खुश हैं या हमसे बहुत खुश है

इन दोनों में से किसे चुनें बस इस अंतर को समझनें का जरिया चाहिए

खिलते फूल को देखकर खुश हो या तोड़कर खुश हो

बस इस अंतर को समझनें का नजरिया चाहिए

किसी को तन सुन्दर लगता है किसी को मन सुन्दर लगता है

लेकिन असल में सुन्दर क्या है इसे पहचान लो बस और क्या चाहिए

खुद ज्यादा खाकर देखो या उसमें से किसी भूखे को खिलाकर देखो

असली खुशी का मजा किसमें है कम से कम ये आजमां कर तो देखो

बच्चों की शैतानियों में जो रूठ जाते हो तुम

कभी उनकी शैतानियों में जिंदगी का मजा उठाकर तो देखो

वृद्ध माता-पिता हों या दादा-दादी , उनको बस आपका थोडा़ सा समय चाहिए

दो पल ही सही उनके साथ थोडा़ सा गुनगुना कर तो देखो

जिंदगी बहुत खूबसूरत है हम सब के लिए , तुम बस बेवजह खुशियां बरसा कर तो देखो

हां माना बात पुरानी है लेकिन पते की है, तुम बस इन बातों को अपनाकर तो देखो।

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